दुर्गा रूप हैं माँ, जग कल्याणी, हे! शक्ति दायिनी मात भवानी। नैनों में समाई तुमने प्रेम की ज्योति, प्रलय को रोक लेती तुम हो सृजनकारी। शांति, सौम्यता की देवी शीतला रानी, माँ मुझे विश्राम दें सारे जग की महारानी।
रानुप्रिया(रायपुर):- नवरात्रि में भक्त की भक्ति चरम सीमा पर होती है। मातारानी की कृपा प्राप्त करने के लिए पूजन, यज्ञ-हवन और भोग-भंडारे की व्यवस्था की जाती है। ऐसे लगता है समस्त संसार भक्ति के रस में डूबकर अपने जीवन को सार्थक बनाने में जुटा होता है। कोई अखंड ज्योत जलाकर पूजा की थाली में रोली, कुमकुम और पुष्प लेकर बड़ी श्रद्धा से मंदिर जाते हैं। आंख बंद कर मातारानी से अपना दुख-दर्द व्यक्त कर एक सुकून भरी सांस लेते हैं। उन्हें लगता है माता जगत-जननी है, वो सबकी करुण पुकार सुनती हैं। क्योंकि विश्वास की एक अलौकिक लौ जलती है उनके मन में जिसे मां दुर्गा कभी बुझने नहीं देती। सच है – शुद्ध हृदय, सकारात्मक सोच, आध्यात्म की राह मनुष्य को कभी भटकने नहीं देती। यही कारण है कि हिंदू धर्म सत्य-सनातन धर्म है जो अपनी परंपरा और धार्मिक स्वभाव के कारण सदा ही श्रेष्ठता को धारण करता है।
भगवान भी अवतरित हुए हैं अपने भक्तों की भक्ति से प्रसन्न होकर। लोग सांसारिक समस्याओं से व्यथित होकर मन्नतें मांगते हैं और पूरी होने पर चढ़ावा देने दूर-दूर तक देवी के धाम जाते हैं। मंदिरों में लंबी कतार लगाकर माता के जयकारे लगाते हैं। कोई बिना चप्पल के चलते हैं घुटनों के बल, मंदिर की सीढ़ी पार करते हैं। तो भक्ति की शक्ति के बल पर नौ दिन और रात ज्योत जवारा को अपनी छाती में रखते हैं। अपनी क्षमता अनुसार व्रत उपवास भी करते हैं। मनोरम भावपूर्ण दृश्य होता है। मानो आध्यात्म की गंगा सी बहती है। कहीं भजन-कीर्तन में मगन जनमानस, भोग-भंडारे में एक पंक्ति में प्रसाद ग्रहण करते मंदिर में एक ही पंडाल के नीचे श्रद्धालु, सुबह-शाम मातारानी की आरती में साक्षात मां दुर्गा अपने नौ रूप से अपने भक्तों पर कृपा बरसाती हैं। ममता-स्नेह की मूर्ति दयालु माता कभी किसी को निराश नहीं करती।
हर धार्मिक आयोजन का उद्देश्य मानव में सद्व्यवहार का संचार करना, दुर्गुणों का त्याग और जनकल्याण के लिए तत्पर होना होता है। कोई भी धर्म आपस में बैर, क्रोध, छल-कपट, लालच, अत्याचार, आतंक की शिक्षा नहीं देता। क्योंकि हम जानते हैं मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना। किसी भी धर्म के मानने वाले हों, सबके अलग तौर-तरीके होते हैं। रास्ते अलग हो सकते हैं लेकिन मंजिल एक ही होती है इंसानियत के गुणों का विकास करना। हृदय की एक ही आवाज होती है सर्वेभवन्तु सुखिन्… सभी सुखी हों, कोई दुखी न हो, रोग-दोष से मुक्त हों, ऐसे भाव होते हैं।
मां अर्थात ममता की मूर्ति। पत्थर की मूर्ति की आराधना से उनमें जान आ जाती है, उनकी सच्ची उपासना से हर कष्ट दूर होते हैं। क्योंकि वो जगत माता हैं पालनहार हैं, जिसकी वंदना और स्तुति से आत्मिक सुख की प्राप्ति होती है। कहते हैं हर घर में देवी होती हैं साक्षात मां, बहिन, बेटी और बहू के रूप में। जो करुणा, दया, वात्सल्य और स्नेह से पूर्ण होती हैं। अपने कर्तव्य के पथ पर चलकर समर्पित भाव से सबकी सेवा करती हैं। इस दृष्टि से मातृशक्ति पूज्यनीय है। जब तक वो सुरक्षित और सुखी नहीं होंगी, मंदिर की देवी के लिए आप कोई भी जतन कर लें, वो कभी प्रसन्न नहीं होंगी। हम कहते हैं – जहां नारी की पूजा होती है, वहां देवता निवास करते हैं। जानते तो सभी हैं पर मानते कहाँ हैं?
नारी के विषय में वैसे तो बहुत ही सम्मानजनक वचन कहे जाते हैं, भाषणबाजी की जाती है… बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ, नारी शक्ति महान है, बेटे-बेटी एक समान, भ्रूण हत्या पाप है, दहेज लेना पाप है, कन्यादान महादान, नारी दुर्गा, काली, चंडी, शारदा व लक्ष्मी की अवतार हैं आदि। महिला दिवस या बालिका दिवस पर विभिन्न आयोजन होते हैं जिसे देखकर मन गदगद हो जाता है। उनको विभिन्न क्षेत्रों में शानदार प्रदर्शन के लिए मेडल प्रदान कर अखबार में कवरेज किया जाता है। ऐसे लगता है जैसे पूरी दुनिया तैनात हो गई मातृशक्ति की सुरक्षा में, अब चिंता की कोई बात नहीं। अब वह निर्भय होकर शान से जी सकती हैं। पुरुष शक्ति एकजुट है बेटी, बहू और मां को राम-कृष्ण बन बचाने के लिए।
लेकिन इसके दूसरे पहलू को देखकर रूह कांप जाता है, पता चलता है यह सब एक आडंबर है, षडयंत्र है, एक भ्रम है। क्योंकि आज भी बीच सड़क में बेटी को घसीटते ले जाकर उन पर अत्याचार किया जाता है। भरी भीड़ बचाने की बजाए वीडियो बनाते हैं और उन्हें वायरल कर वाहवाही लुटते हैं। इतना ही नहीं, बेटी के पैंतीस टुकड़े कर फेके जा रहे हैं। सामूहिक बलात्कार कर वहशी दरिंदे बेफिक्र घूमते हैं। हद तो तब हो जाती है जब मानवता उस वक्त शर्मशार हो जाती है जब कोई सुराख नहीं मिलता, कोई गवाही देने तैयार नहीं होता। अपनी जान बचाने और कानूनी कार्यवाही के डर से भीड़ भाग जाती है। सड़क में, जंगल में और सुनी राह में बेबस, लाचार और मदद के लिए गुहार लगाती बेटी, बहू और मां को छोड़कर उस वक्त कहां जाते हैं नारी शक्ति जिंदाबाद का नारा लगाने वाले, क्यों आगे नहीं आते न्याय दिलाने के लिए?
बालिका शिक्षा की सीख देने वाले महिला दिवस पर बड़े-बड़े आयोजन कर दिखावटी सम्मान करने वाली संस्था क्यों उस समय संगठित नहीं हो पाती, जब किसी बेटी की इज्जत से कोई दरिंदा खिलवाड़ करता है? मां को हम देवी मानकर पूजते हैं, फिर वो किसकी मां होती हैं – जो झुकी कमर, कंपकपाते हाथ, झुर्रियों से भरे चेहरे, नम आंखों से बेबस, लाचार, दुखी होकर सड़कों पर भीख मांगती दिखती हैं? आज भी कई घरों में एक कोने में बीमार, खांसती, बुखार में तपती, सबके होते असहाय जीवन!, बदत्तर ज़िन्दगी जीने को मजबूर दिखाई देती हैं। दर्द से चूर कराहती हैं, किसी के पास समय नहीं उनके पास जाने का, उनकी सेवा जतन का। जिस मां ने ममता की गोद में पालन-पोषण किया, हर दुख सहकर जीवन समर्पित किया, उनके बारे में सोचने के लिए समय नहीं। ये क्यों भूल जाते हो आप भी कभी बुजुर्ग होंगे तब क्या होगा। जब आपसे वही बर्ताव आपके बच्चे करेंगे। भूलना नहीं, हर मां में देवी की छवि होती है। उनकी सेवा, सत्कार, सम्मान और पूजन के बिना आपके सारे तीर्थधाम बेकार हैं। उस दिन देवी पूजन पूरी तरह सार्थक होगी जब पूरी दुनिया संगठित होकर रक्षा कवच तैयार कर लेगी मातृशक्ति की सुरक्षा के लिए। तब जीत होगी हर बेटी, बहू, बहिन और मां की। कोई रावण पार न कर पाएगा दहलीज सीता हरण के लिए, तब सही अर्थ में मां की पूजा हो पाएगी।
मोहनी हैं मूरतिया लगती हो प्यारी, आश और विश्वास तुम्ही हो नारायणी।
मंगलमयी हो शुभकर्ता तुम ही वैष्णवी, सर्वसुख दात्री शिवप्रिये तारणहारी।
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