रानुप्रिया(रायपुर):- स्वातंत्रय-बोध: संकल्प, संस्कृति और समर्पण: आजादी की सार्थकता तभी सिद्ध होगी, जब हर दिन राष्ट्र के प्रति सम्मान की भावना होगी। देशप्रेम का जज्बा धड़कन में रहेगा, तब जवान तुझे सलाम पूरा हिंदुस्तान करेगा।
जन-गण-मन का सदा ही, तुम सम्मान करो, वंदेमातरम जयघोष से, गूँजित आसमान करो।
हर जुबाँ को ‘जयहिंद’ का, पावन मूल्य बताओ, शहीदों के बलिदान को, सहृदय याद करो।।
उत्सव शब्द सुनते ही हर मन में एक असीम उत्साह का संचार होने लगता है। भारतीय संस्कृति की यह एक अनुपम विशेषता है कि यहाँ विभिन्न धर्मों, जातियों, संप्रदायों, भाषाओं और वेशभूषाओं के लोग निवास करते हैं। सबकी अपनी विशिष्ट परंपराएँ और रीति-रिवाज हैं, जिन्हें सभी मिल-जुलकर हर्षोल्लास के साथ मनाते हैं। वास्तव में ये पर्व-त्योहार ही हैं, जो हमें आपसी प्रेम के सूत्र में पिरोकर रखते हैं और जिनमें हमें अपनी सभ्यता एवं संस्कारों की अनूठी झलक दिखाई देती है। आजादी की सार्थकता तभी सिद्ध होगी जब हर दिन राष्ट्र के प्रति सम्मान की भावना होगी। देश की स्वतंत्रता को सफल बनाने के लिए आवश्यक है। राजनीति के शिकंजे से इसे दूर रखना। वैसे तो हम आजाद हैं, पर दूषित मानसिकता के हम गुलाम हैं। देश की समस्याएं – प्रतिस्पर्धा की होड़, बाह्य आडंबर, अंध-विश्वास, पद-प्रतिष्ठा व नाम के लिए अपने संस्कार को भूलते जा रहे हैं। सबसे पहला धर्म होता हैं राष्ट्र के प्रति प्रेम। लेकिन आज सर्वत्र झगड़े, दंगे-फसाद, आतंक व अत्याचार हैं। झूठ, छल-कपट, बेईमानी के उफान हैं, भाई-भाई में बैर के भाव, कहीं जमीन के लिए आपस में मनमुटाव हैं…जाति-मजहब धर्म और संप्रदाय के नाम पर हो रहे विवाद, रैली-प्रदर्शन, मांगे-हड़ताल और तोड़-फोड़ के दृश्य हैं। ऊँच-नीच के भेद, शोषण, भ्र्ष्टाचार, रिश्वतखोरी, कालाबाजारी और देशद्रोही अपने चरम सीमा पर हैं। अपनी बोली-भाषा, आचार-विचार व व्यवहार को ही महान बताने में लगें हैं।हमें अपने देश के प्रति सम्मान और प्रेम की भावना को बढ़ावा देना चाहिए। अपने संस्कारों और सभ्यता को पुनर्जीवित करना चाहिए। हमें आधुनिकता की दौड़ में पीछे नहीं रहना चाहिए। हमें वसुदेव कुटुम्बकम को मूलमंत्र बनाना चाहिए। हमें अपने देश के विकास में योगदान करना चाहिए।
माँ भारती की गुलामी की पीड़ा : माँ भारती की गुलामी की पीड़ा है, जिसमें असंख्य माताओं ने अपना वीर सपूत खोया, बच्चे यतीम हुए, न जाने कितनी सुहागिनों के मांग के सिंदूर उजों के मांग के सिंदूर उजड़ गए। तब जाकर आज आजादी की खुली हवा में चैन की सांस ले पा रहे हैं। अंग्रेजों की कैद में ज़िन्दगी नरक तुल्य थी, पल-पल जिंदगी घुटन थी। एक चीख दर्द और कराह थी आजादी की। जिसे वीर योद्धाओं ने महसूस किया और अपनी जान की परवाह किए बिना कूद पड़े संघर्ष की अग्नि में। आजादी का यह संघर्ष सौ साल से भी अधिक चला। स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की वजह से हम आज चैन की सांस ले पा रहे हैं। हमारी पीढ़ी उनके इस बलिदान के सदा ऋणी रहेंगे वे स्वतंत्रता आंदोलन के आधार स्तंभ थे। शहीदों की जीवन गाथा को पढ़ें और अनुकरण करें, यह भी हमारी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। आज हम आजाद हैं अपनी अभिव्यक्ति के लिए, सोचने-समझने, घूमने कहीं भी जाने, अपनी जिंदगी जीने के लिए। यह आजादी हमें कैसे मिली? वीरो की कुर्बानी से जिन्होंने अपना सबकुछ समर्पित कर दिया। बलिदान की राह में चल पड़े बिना किसी स्वार्थ के। देश के महनीय नेता: गाँधी, सुभाष, तिलक, टैगोर, भगतसिंह, चंद्रशेखर आजाद, लाला लाजपतराय और कई वीरांगनायें झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, दुर्गावती, अहिल्याबाई और कई ऐसे नाम हैं जो दफन हो गए स्वतंत्रता की बलिवेदी में आजादी का स्वप्न देखते। आज की पीढ़ी: आज की पीढ़ी में शिक्षा की एक ऐसी व्यवस्था है, जहाँ पढ़-लिखकर सिर्फ नौकरी के लिए उत्सुक रहते हैं। डॉक्टर, वकील, इंजीनियर, पायलेट, वैज्ञानिक और ऊंचे पद पर ही जाना चाहते हैं। अपने समाज, परिवार, राष्ट्र और देशप्रेम की भावना से परे भटक गए हैं। देश के हेतु के लिए काम करें – आज जरूरत है उनमें कर्तव्यों का बोध कराने की, देशभक्त बनाने की। ताकि भारत माता फिर से सोने की चिड़िया बने, जग सिरमौर बने। यह वसुंधरा शस्य-श्यामला रहे, चारों तरफ खुशहाली हो। देशद्रोही, आतंकवादी, रिश्वतखोर और अत्याचारियों का अंत हो। आगे आएं युवा रूढ़िवादी विचारों को मिटाने, प्रगति के मार्ग में अग्रसर होकर सहयोग करें। भारतीय संस्कृति का सम्मान करें, भाईचारे के भाव हो। स्वार्थ से ऊपर हो, आधुनिकता की दौड़ में न भागे।
‘वसुधैव कुटुंबकम्’ को मूलमंत्र बनाओ, संकुचित दायरे से बाहर अब निकलो।
धरती के उपकार का ऋण चुका दो, मुश्किलों से डरकर कभी मत भागो।
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