नारी तू है शक्ति, तू ही है जग की रक्ति। नारी तू है आग, तू ही है जीवन की राग। नारी तू है शक्ति, तू ही जग की मुक्ति।
रानुप्रिया(रायपुर):- नारी, एक ऐसा शब्द जो शक्ति, प्रेम और समर्पण का प्रतीक है। नारी शक्ति से ही जग की रचना हुई है, तथा नारी ही है जो जीवन को अर्थ देती है। नारी के बिना जीवन अधूरा है, और नारी की शक्ति के बिना जग की कल्पना नहीं की जा सकती। नारी ने हर क्षेत्र में अपनी शक्ति का परिचय दिया है, चाहे वह घर हो, समाज हो या देश। नारी की शक्ति और समर्पण ने जग को एक नई दिशा दी है, और आगे भी देती रहेगी। इस महिला दिवस पर, आइए नारी शक्ति का सम्मान करें, और नारी के अधिकारों की रक्षा करने का संकल्प लीजिए। नारी शक्ति की महिमा अपरंपार है। सृष्टि की श्रृंगार है नारी। भारतीय सभ्यता और संस्कृति की वाहक होती है नारी। शक्ति, साहस और धैर्य की देवी है नारी। आज भी हर पल अग्नि परीक्षा से गुजरती है नारी। धरा पर धरती सी धीर है नारी, सृष्टि की श्रृंगार है। भारतीय सभ्यता और संस्कृति में सदा ही नारी को पूजनीय माना गया है। हर रूप में समर्पण और लगन से श्रेष्ठ प्रदर्शन कर उच्च स्थान प्राप्त करती है। अपनी कोख में नौ माह बच्चे को सहेजकर रखती है, उसे पल्लवित व पुष्पित करती है। प्रलय की गोद में बैठकर भी सृजन करती है, अंधकार से अबोध मन को निकालकर रोशनी से युक्त दुनिया से परिचय कराती है। असीम शक्ति से भरपूर, ऊर्जावान होती है नारी, तभी वह देवी का अवतार कहलाती है। माँ बच्चों को व्यवहारिक ज्ञान देती है,संस्कारित करके घर के ही दायरे से निकलने के लिए उसे प्रेरित करती है,बाहर की दुनिया से भी अवगत कराती है, शिक्षा जगत का सार समझाती है, तब वह ज्ञान की देवी माँ शारदा के रूप में होती है। असंख्य कष्टों को सहन कर समर्पण के पथ पर चलती है। त्याग-तपस्या के बल पर परिवार के हर सदस्यों की जरूरतों को पूरा करती है, सुबह से उठकर निरंतर काम ही करती है। और रातों में बच्चों को मीठी सी लोरी सुनाकर सुलाती है, बदले में कुछ नहीं चाहती, परिवार की खुशी के लिए हर संभव प्रयास भी करती है। दुख की घड़ी में हर असंभव को संभव बनाने के लिए जिस शक्ति का प्रयोग करती है,उस समय वह साक्षात माँ दुर्गा होती है। पाई-पाई जोड़कर रखती है,खुद भूखी रहकर भी सभी की भूख मिटाती है,अपने सदाचरण से घर में सुख-समृद्धि लाती है, तब अन्नपूर्णा की देवी माँ लक्ष्मी कहलाती है। जब अधिकारों के लिए वह लड़ती है,दुष्ट-पापी और दुराचार, वहशी दरिंदों से अपनी आबरू की रक्षा करती है, तब वह अपने रौद्र रूप चंडी व काली का दिखाती है। नारी ही नारायणी है, जो समय व परिस्थिति के अनुसार हर रंग में घुल मिल जाती है, साहस व सूझबूझ से कार्य करती है, जिसके बिना इस सुंदर जहान की कल्पना नहीं कर सकते। देवी के रूप में वह परिभाषित है, फिर भी आज नारी अपने वजूद के लिए दर-दर भटकती है,अपने स्वाभिमान को तब भी आंच नहीं आने देती! महान् ग्रंथों और वेद-पुराणों में भी नारी को वंदनीय ही कहा गया है। गौर से कभी देखे तो! समझेंगे कि सिसकती है, रूठती है, बिखरती है, टूटती है, रूंदन होता है सांसों में,प्रश्नचिन्ह होता है एहसासों में, घुटन भी होता है, उसे भी व्यक्त नहीं कर पाती अपनी व्यथा कभी। घर, परिवार, पड़ोस और समाज के दायरे में संदेह के घेरे में होती है। दोनों कुलों की लाज रखती है, प्रीत-पराई अपनाती है।…सवाल का सटीक जवाब देती है। इस पुरुष-प्रधान देश में सदा ही वह कमजोर कहलाती है। अपनी हर एक चाहतों को दिल में दफन करती है, हर वक़्त क्यों, कैसे और कहाँ? जैसी छोटी मानसिकता के लोगों का सामना करती है।…दोहरे जिम्मेदारियों को निभाते हुए घर और बाहर की दुनिया में भी वह संतुलन रखती है। जब हद से बाहर हो जाएं बंदिशें, तब लांघ वो जाती है लक्ष्मण रेखा, रावण की लंका जलाने के लिए आतुर हो जाती है। सब्र का इम्तिहान हर पल हर मोड़ में होता है, वह रुकती नहीं और थकती नहीं, चलती है अनवरत अपनी राह, आज नारी किसी भी क्षेत्र में पीछे नहीं, पुरुष प्रधान इस देश में कदम से कदम मिला कर चल रही है। पुलिस, डॉक्टर, इंजीनियर, जज, पायलट बनकर हौसलों की उड़ान भर रही है। नवरात्र में शक्ति के ही नौ रूपों की पूजा की जाती है, श्रद्धा, आस्था व धर्म की ज्योत जलाई जाती है, नारी करुणा, ममता, स्नेह व प्यार की मूरत है। जिस जगह भक्ति और पवित्रता का मिलन होता है, वही मातारानी का आशीर्वाद होता है। लोभ, क्रोध, मद-माया से युक्त जीवन पशुतुल्य होता है,मातारानी के जगराते में सेवा, संयम, सौम्यता और सहयोग का सौभाग्य प्राप्त होता है,जो हमारे मन में सद्कार्य के भाव विकसित करते हैं।अष्टमी के दिन कन्यापूजन किया जाता है,ऐसी मान्यता है कि माँ नौ दुर्गा इन कन्याओं के रूप में साक्षात इस धरती पर विराजमान होती हैं। बहुत ही सुंदर सोच है,बेटी माता का रूप होती है।…अनेक बार देखा गया है कि अष्टमी के दिन छोटी बेटियों को ढूंढते फिरते हैं, कमी हो जाती है, पूजन के लिए बेटियों की। मन में विचार आता है – वे लोग कौन होते हैं जो बेटे की चाह में बेटियों को इस दुनिया में आने नहीं देना चाहते,दहेज की बलिवेदी पर चढ़ा देते हैं,शिक्षा, संपत्ति के बंटवारे, पालन-पोषण में भेदभाव करते हैं। अखबारों में खून से लथपथ बेटी के शव कहीं जंगल व झाड़ी, सुनसान सड़कों पर पड़ी होती हैं, कारण हवस के वहशी दरिंदों ने ही नोच डाली मासूम की जिस्म, ये खबर रोज पढ़ने को मिलती हैं, अनेक वारदात होते हैं जिनका कोई सुराख नहीं मिलता,चिंतनीय विषय है। बेटा, भाई, और एक पिता बन मातृशक्तियों की ढाल बनो।…तब माता रानी प्रसन्न होगी व कन्या पूजन की सार्थकता सिद्ध होगी। शिवशक्ति के संयोग से ही नर और नारी बन इस लोक में सांसारिक जीवन की गाड़ी चलती है, नारी भोग की वस्तु नहीं, पूज्या है। सम्मान की अधिकारी है। वह शोषित, पीड़ित और दुखी नहीं, शक्ति की भी अवतारी है, यह सभी को स्वीकार करना ही होगा। प्रत्येक समय नारी को अपनी बेगुनाही को प्रमाणित करना पड़ता है, माता सीता जैसी पतित पावनी देवी को भी अग्नि परीक्षा से गुजरना पड़ा। आइजिए हम सभी मिलकर एक ऐसे माहौल का निर्माण करें। जहाँ माँ, बहन और बेटियाँ सुनी सड़कों में बेखौफ जा सकें, सहमी, डरी और दहशत में न हों भारत की नारियां…एक ऐसी न्याय व्यवस्था हो। जहाँ रूह कांप जाए दरिंदों की किसी बेटी की तरफ आंख उठाने से पहले,फिर से कोई बेगुनाह निर्भया की चीख न सुनाई दे, तब देवी दुर्गा अपने नौ रूपों में आपकी हर इच्छा पूरी करेगी, और नारी को शब्दों में माँ का दर्जा देने की बजाय हृदय की गहराइयों से, पवित्र भावों से वंदनीय, पूजनीय बनाएँ। जिस घर में नारी दयालु, धर्मनिष्ठ, पारिवारिक, सेवाभावी, त्यागी, सहनशील, ममतामयी, पतिव्रत और हर रिश्तों को संजोकर रखती है, उस घर में माँ, बहन, बेटी के रूप में साक्षात मातारानी होती हैं, नारी ही संवारती है अपने हर रूप में परिवार रूपी महकती इस रंग-बिरंगी बाग़बान को सदा ही सम्मान दें, देवी की उस अवतार को। वास्तव में, नारी एक सबसे सर्वश्रेष्ठ शक्ति और अनोखी, दिव्य होती है। करुणा और त्याग का प्रतीक है। नारी का अपमान ही संसार का सबसे बड़ा अपमान होता है। नारी के सम्मान से ही संस्कृति और सभ्यता पुष्पित तथा पल्लवित रह सकेगी। नारी शक्ति ज़िन्दाबाद |

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