रानुप्रिया(रायपुर):- वो तमाशा देखते रहे… आधी रात, एक सूनी सड़क, और ज़ोर से टक्कर की आवाज़! एक बड़े हाईवे और कार की टक्कर।
एक इंसान जो तड़प रहा था, मलबे में दबा, अंदर ही तड़प रहा था, पर कानून के वो रखवाले, खाकी पहने वो रखवाले…
बस तमाशा देखते रहे, कोई आगे नहीं आया।
40-50 गुंडे, जो नशे में धुत खड़े थे, वहां इंसान तड़प रहा था, और ये गुंडे रास्ता जाम करने लगे, गाड़ियों के ड्राइवरों को पीटने लगे,
माल और पैसे लूटने लगे, गाड़ियों को नुकसान पहुंचाने लगे…
और वो खाकी पहने रक्षक, तमाशा देखते रहे।
इसी आधी रात, इसी सन्नाटे में, फल मंडी की दो गाड़ियां गुज़रीं, ताज़ा फल लदे थे जिनमें, उन्हें बेवजह ही रोक दिया गया।
गाड़ी लूटने, तोड़ने-फोड़ने की कोशिश की उन नशेड़ी गुंडों ने,
और वो खाकी पहने रक्षक, तमाशा देखते रहे।
यही तमाशा देखने वाले, इन्हीं गाड़ियों के चालकों की रोज़ी-रोटी, उनकी मेहनत की गाढ़ी कमाई लूटते हैं।
दूर से ही भांप लेते हैं, किस राज्य या ज़िले की गाड़ी है, इनकी शातिर नज़रों से कभी कोई नंबर-प्लेट ओझल नहीं होती।
बात वसूली की हो, तो पैसे के लिए मील दूर तक पीछा करते हैं,
और गाड़ी के सारे कागज़ात पूरे हों, तो ‘चाय-नाश्ते’ की मनुहार करते हैं!

लगता है सरकार से मिलने वाली तनख्वाह से इनका घर नहीं चलता, कभी चालान, कभी ओवरलोडिंग, तो कभी न जाने किन बहानों से डसते हैं,
बिना रिश्वत दिए, किसी बेबस को जाने नहीं देते। पर अफ़सोस! जब इन्हीं गाड़ी वालों को बचाने की बारी आई, जब इन पर आफ़त आई और रक्षकों की ज़रूरत पड़ी, तो इन्हीं खाकी वालों ने आँखों पर पट्टी बाँध ली, जब ऐसी खौफनाक वारदात होती है,
तो यही खाकी पहने रक्षक… हाथ बांधे तमाशा देखते रहे।
ये तमाशा सिर्फ सड़क पर नहीं चल रहा, हर रोज़ इस देश के लोगों का भरोसा है बदल रहा। रक्षक ही जब भक्षक बन मौन खड़े रहेंगे,
तो आम जन आख़िर किसे अपना कहेंगे? चीखती रही इंसानियत, लहू सड़क पर बहता रहा, और ‘सिस्टम’ का वो पहरेदार, चुपचाप तमाशा देखता रहा।
राजेश्वरी साहू “संवादिनी”
14/06/2026
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